बदल रहा परिवेश गाँव का,
लेकर के रफ्तार।
गाँव गाँव क्यों नहीं रहा अब,
हे! मेरे करतार?
बदल रहे चाचा, ताऊ के,
सबके तुनक मिजाज।
चाची, ताई, औ बहनों ने,
भूले सभी रिवाज।
जिनको अ से अदब ना आया,
बने पड़े मुख्तार।
खलिहानों में फसल न उगती,
बसते हैं अब ढोर।
सूरज सिर पर चढ़ आता है,
तब होती है भोर।
सूने पथ, बेचारे पनघट,
पीपल तरु लाचार।
नब्बे की अम्मा से मिलकर,
पता चली इक बात।
कितने सुन्दर दिन थे कहकर,
छलक पड़े जज्बात।
जगराते कहती थी अपने,
अब हैं बन्द किवार।