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बाँस के बाँसुरिया रे, बड़ी गुण तोर रे / भवप्रीतानन्द ओझा

झूमर

बाँस के बाँसुरिया रे, बड़ी गुण तोर रे
हाँ रे बाँसी। नाशले जाति-कुल मोर रे
तोर शब्दें बाँसी! भेले मति भोर रे
हाँ रे बाँसी! चितें जागे कालिया किशोर रे
मन उचटाबे रे, यौवना करे जोर रे
हाँ रे बाँसी। छट दे टपके नैना लोर रे
भवप्रीता कहे बाँसी! होय गेले शोर रे
हाँ रे बाँसी! तोहीं बाँसी राधा चितचोर रे।