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बुत-ए-ख़ाक हूँ मैं बनूँगा – मिटूँगा / फूलचन्द गुप्ता

बुत ए खाक हूँ मैं बनूँगा – मिटूँगा
चलूँगा – रुकूँगा, रुकूँगा – चलूँगा

मैं सूरज नहीं हूँ, न ही माहो अंजुम
दिया हूँ, घरों में जलूँगा – बुझूँगा

समन्दर की लहरों में हैं मुल्क़ मेरा
इसी ख़तरे सू में जिऊँगा – मरूँगा

मोहब्बत की आतिश में महफूज़ हूँ मैं
कि चिनगारियों-सा उठूँगा – गिरूँगा

अज़ल से तज़रबात इफ़लास के हैं
इन्हीं की ग़ज़ल मैं कहूँगा – पढ़ूँगा