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बेशर्मी से तान के सीना हँसते हैं / सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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बेशर्मी से तान के सीना हँसते हैं ।
लोग आजकल तोड़ के रिश्ता हँसते हैं ।

सूख कभी जाते हैं जब बहते-बहते,
दरियाओं को देख के सहरा हँसते हैं ।

मैंने देखा है फ़क़ीर की आँखों में,
क़ाबा, काशी और मदीना हँसते हैं ।

अपनी रोती आँखों को समझाकर हम,
अपने घर में होकर तन्हा रोते हैं ।

शक़ल देखने लायक होती लोगों की,
हाथ में जब हम लेकर कासा[1] हँसते हैं ।

अक्सर यही तो होता है रोते-रोते,
बच्चे माँ का देख के चेहरा हँसते हैं ।

बचपन के हैं दोस्त हमारे ऐसे जो,
देखे के टूटा हुआ खिलौना हँसते हैं ।

शब्दार्थ
  1. कटोरा