Last modified on 17 अगस्त 2013, at 11:06

बे-इंतिहा होना है तो इस ख़ाक के हो जाओ / 'शहपर' रसूल

बे-इंतिहा होना है तो इस ख़ाक के हो जाओ
इमकाँ की मुसाफ़त करो अफ़लाक के हो जाओ

सब क़िस्सों को छोड़ो दिल-ए-सद-चाक के हो जाओ
इस दौर-ए-जुनूँ-ख़ेज में इदराक के हो जाओ

ख़ुशियों से कहाँ रब्त है हम को भी तुम्हें भी
आ जाओ इसी लम्हा-ए-नमनाक के हो जाओ

इस बाग़ में शमशीर-ए-हवा से न बचोगे
ख़ुश रंग हो जाओ किसी पोशाक के हो जाओ

बे-ज़ाएक़ा होने से यही ज़ाइक़ा अच्छा
अशजार से उतरो ख़स ओ ख़ाशाक के हो जाओ

सर-पोशी का फ़न हाथों को सिखलाओ वगरना
बे-आँख के बे-कान के बे-नाक के हो जाओ

‘शहपर’ की तरह ख़ाक से उड़ते ही फिरोगे
बनना है तो बस जाओ किसी चाक के हो जाओ