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बैठ हम नदिया किनारे ध्यान में उलझे रहे / पुष्पराज यादव

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बैठ हम नदिया किनारे ध्यान में उलझे रहे;
धो गयीं निज केश जलपरियाँ नज़र फेरे हुये ।

हर लहर अन्तिम मिलन का
दे गयी संकेत हमको
मुट्ठियों में दे गये तटबन्ध
गीली रेत हमको
और हम निरुपाय सीने से लगाये निज व्यथा,
लौट आये इन्द्रपुर से हाँ नज़र फेरे हुये ।

मिल न पाये हाथ रूपा से
मिलन का पल गया,
कह न पाये बात भी मन की
कि जीवन छल गया
हम स्वयं जब फैसले पर आज कल करते रहे
हँस पड़ीं तब हम पर कुछ सदियाँ नज़र फेरे हुये ।

लहलहाते खेत सरसों के
खिले झरते गये
हर्ष के आयास लघुता को
ग्रहण करते गये
व्यर्थ ही खिलना हमारा बिजलियों के देश में,
सोचकर कुम्हला गयीं कलियाँ नज़र फेरे हुये ।

वेदना में ही हमारा चिर
निहित होगा सखे!
देखना तुम स्वयं यह विरही
विजित होगा सखे!
द्वार दुख के खोल दो अपने कि आख़िर किसलिये
देखकर कुढ़ती हैं यह गलियाँ नज़र फेरे हुये ॥