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भाषा का भी ज्ञान नहीं है / बाबा बैद्यनाथ झा

भाषा का भी ज्ञान नहीं है, नहीं जानता छन्द।
बने गीतिका कैसे मुझसे, मैं तो हूँ मतिमंद।।

सरस्वती का ध्यान लगाकर, पूजन करता नित्य।
वही पंक्तियाँ हाथ पकड़ कर, लिखवा देती चंद।।

पाठकगण जब करे प्रशंसा, हो जाता हूँ धन्य।
मधुप सदृश कुछ पीने लगते, कविता का मकरंद।।

आभासी रचनाकारों से, जब भी होती भेंट।
तर्क अनावश्यक से मन में, होता अन्तर्द्वन्द।।

पूर्ण समर्पित कर बाबा मैं, लिखता जब साहित्य।
ब्रह्म सहोदर के दर्शन से, मिलता परमानंद।।