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भैया बाल.... / संजीव बख़्शी

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पीछे बस्ती के बच्चे
चार से दस साल के
खेलते हैं क्रिकेट तो खेलते हैं और
हल्ला भी बोलते हैं

यह सरकारी कालोनी है
चारों ओर क्वार्टर, बीच की खाली जगह
यह है मैदान क्रिकेट का
पड़ते हैं चौके, छक्के
यह रोज़ की बात है
सूर्योदय से सूर्यास्त और उसके बाद तक की
जब तक बॉल दिखना बंद न हो जाए
और बल्कि उसके बाद भी

अक्सर बॉल मेरे कैम्पस में घुस आता है
तब गेट पर होते हैं बच्चे
चार से दस के सब के सब

भैया बॉल, भैया बॉल....

पास एक मझोले से मेले में बड़ी भीड़ है
बस्तियाँ सारी खाली हो गई लगता है आज
पर
कोई नहीं दिख रहा जाना पहचाना
कि रुक कर बात ही कर लें
नए-नए चेहरे

मैं सोच में था ही कि देखता हूँ एक बच्चा
कोई छह साल का
पीले-लाल कपड़ों में
सिर पर एक कपड़ा बँधा
मुझे देख वह मुस्कराया
यह जान पहचान वाली मुस्कान
कोई दोस्ताना रिश्ता हो इस तरह
पर
कहाँ मैं छप्पन का और कहाँ वह छह का

अभी वह माँ की अँगुली पकड़े मुस्करा रहा था
और क़रीब से निकल रहा था
अभी मेरा ध्यान उसकी ओर ही था कि उसने
धीरे से कहा

भैया बॉल ....