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मेरी प्यारी, वह क्षण आया / अलेक्सान्दर पूश्किन

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»  मेरी प्यारी, वह क्षण आया

मेरी प्यारी वह क्षण आया, चैन चाहता मेरा मन,
बीत रहे घण्टों पर घण्टे, सतत उड़े जाते हैं दिन,
और इन्हीं के साथ हमारा, ख़त्म हो रहा है जीवन,
हम दोनों जीने को उत्सुक, किन्तु आ रहा निकट निधन,
इस जग में सुख-ख़ुशी नहीं है, किन्तु चैन है, चाह यहाँ,
एक ज़माने से मन मेरा, मुझे खींचता दूर, वहाँ-
जहाँ बैठकर सृजन करूँ मैं और चैन मन का पाऊँ,
दास सरीखा थका हुआ मैं, सोचूँ, भाग कहीं जाऊँ।

रचनाकाल : 1834