भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

युग-युग को पार कर आया आषाढ़ आज मन में / रवीन्द्रनाथ ठाकुर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मुखपृष्ठ  » रचनाकारों की सूची  » रचनाकार: रवीन्द्रनाथ ठाकुर  » संग्रह: निरुपमा, करना मुझको क्षमा‍
»  युग-युग को पार कर आया आषाढ़ आज मन में

बहु युगेर ओ पार हते आषाढ़ एल आमार मने,
कोन् से कबिर छंद बाजे झरो झरो बरिषने ।


युग-युग को पार कर आया आषाढ़ आज मन में,
बजता है किस कवि का छंद आज घन में ।।
धूल हुई मालाएँ जो थीं मिलन की,
गंध बही आती है उनकी पवन में ।।
रेवा के तीर छटा ऐसी थी उस दिन
शिखरों पर श्यामल थी वर्षा ही पल-छिन ।।
पथ को थी हेर रही मालविका क्षण-क्षण
बह आई मेघों के साथ वही चितवन ।।

मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

('गीत पंचशती' में 'प्रकृति' के अन्तर्गत 41 वीं गीत-संख्या के रूप में संकलित)