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यूँ तो फितरत पाई है दीवाने की, / सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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यूँ तो फ़ितरत पाई है दीवाने की ।
लेकिन क़िस्मत मिली हमें वीराने की ।

आते जाते हैं अहसास यतीमों से,
गली हूँ जैसे मैं इक लंगरख़ाने की ।

जाने किसका तोड़ दिया था हमने दिल,
सज़ा मिली है टूटे काँच उठाने की ।

ख़्वाब नया फिर से पैदा हो जाता है,
जब-जब ख़्वाहिश होती है मर जाने की ।

दहरो-हरम[1] तो ख़फ़ा रहे ताउम्र मगर,
मिलती रही दुआ हमको मयख़ाने की ।

बहरे थे वे लोग़ जो सुनने आए थे,
फूटी थी तक़दीर मेरे अफ़साने की ।

आख़िर कोठों पर उनकी परवरिश हुई,
ग़ज़लें जो थी ऊँचे बहुत घराने की ।

शब्दार्थ
  1. मन्दिर-मस्जिद