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रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक २ / तुलसीदास

राहु मातु माया मलिन मारी मरुत पूत।
समय सगुन मारग मिलहिं, छल मलीन खल धूत॥१॥
माया करनेवाली मलिन (कपटसे भरी) राहुकी माता सिंहिकाको श्रीपवनकुमारने मार दिया। यह शकुन कहता है कि यात्राके समय मार्गमें कपटी, पापी दुष्ट और धूर्त मिलेंगे (उसने सावधान रहना चाहिये।)॥१॥

पूजा पाइ मिनाक पहिं सुरसा कपि संबादु।
मारग अगम सहाय सुभ होइहि राम प्रसादु॥२॥
मैनाक पर्वतसे सत्कार पाकर आगे जाते हुए हनुमान्‌जीसे (नागमाता) सुरसाकी बातचीत हुई। (शकुन फल यह है कि) श्रीरामकी कृपासे विकट मार्गमें भी शुभ सहायता प्रात्प होगी॥२॥

लंका लोलुप लंकिनी काली काल कराल।
काल करालहि कीन्हि बलि कालरूप कपि काल॥३॥
कालके समान भयकर एवं काली, लोभमूर्ति लंकिनी राक्षसी लंकामें (प्रवेश करते ही) मिली, उसे कालरूप बनकर स्वयं भी कालरूप (भयंकर वेश) धारी हनुमान्‌जीने भयकर काल (मृत्यु) के बलि अर्पण कर दिया (मार डाला)॥३॥
(कार्यमें आयी बाधा नष्ट होगी।)

मसक रूप दसकंध पुर निसि कपि घर घर देखि।
सीय बिलोकि असोक तर हरष बिसाद बिसेषि॥४॥
मच्छरके समान (छोटा) रूप धारण करके हनुमान्‌जीने रात्रिमें रावणकी पुरी लंकाका एक-एक घर छान डाला। (अन्तमें) श्रीजानकीजीको अशोकवृक्षके नीचे देखकर उन्हें प्रसन्नता और अत्यधिक दुःख दोनों हुए॥४॥
(प्रश्न-फल मध्यम है, हर्ष-शोक दोनोंका सूचक है।)

फरकत मंगल अंग सिय बाम बिलोचन बाहु।
त्रिजटा सुनि कह सगुन फल, प्रिय सँदेस बड़ लाहु॥५॥
श्रीजानकीजीके मंगलसूचक अंग बायीं आँख और भुजा फड़क रही है। इसे सुनकर त्रिजटा शकुनका फल बतलाती है कि 'प्रियतमके सन्देशकी प्रात्पिरूपी बड़ा लाभ होगा॥५॥
(प्रियजन का समाचार मिलेगा।)

सगुन समुझि त्रिजटा कहति , सुनु अबहीं आजु।
मिलिहि राम सेवक कहिहि कुसल लखनु रघुराजु॥६॥
शकुनको समझकर त्रिजटा कहती है-'जानकीजी! सुनो। आज (अभी) श्रीरामका सेवक मिलेगा और लक्ष्मण तथा रघुनाथजीकी कुशल कहेगा॥६॥
(प्रियजन का कुशल समाचार प्रात्प होगा।)

तुलसी प्रभु गुन गन बरनि आपनि बात जनाइ।
कुसल खेम सुग्रीव पुर रामु लखनु दो‍उ भाइ॥७॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि (हनुमान्‌जीने श्रीजानकीजीसे) प्रभु श्रीरामके गुणोंका वर्णन करके अपनी बात जनायी (अपना परिचय दिया और कहा-) सुग्रीवकी नगरी (किष्किन्धा) में श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाई कुशलपूर्वक है'॥७॥
(प्रियजन का समाचार मिलेगा।)