भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

वाही घरी तें न सान रहै / दास

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वाही घरी तें न सान रहै,न गुमान रहै,न रही सुघराई.
दास न लाज को साज रहै न रहै तनको घरकाज की घाईं.
ह्याँ दिखसाध निवारे रहौ तब ही लौ भटू सब भाँति भलाई.
देखत कान्हें न चेत रहै,नहिं चित्त रहै,न रहै चतुराई.