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<Poem>
ख़्वाब में ये ही तिल्सिमात रहे
अपने हाथों में तेरे हाथ रहे

होके तुझसे जुदा न जी न पाए
खुश रहे जब भी तेरे साथ रहे

हम पे मोहरे चले इधर से उधर
हम तो शतरंज की बिसात रहे

हमने शोहरत तो खूब पायी मगर
हम न इन्सां न उसकी ज़ात रहे

कल का सूरज ज़रूर देखेंगे
हम अगर ज़िन्दा आज रात रहे

ऐ 'मनु' उससे गिला क्या करना
जिनके ईनाम भी खैरात रहे</poem>
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