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03:30, 26 अगस्त 2013 {{KKGlobal}}
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|रचनाकार='फना' निज़ामी कानपुरी
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<poem>
वो जाने कितना सर-ए-बज़्म शर्म-सार हुआ
सुना के अपनी ग़ज़ल मैं क़ुसूर-वार हुआ
हज़ार बार वो गुज़रा है बे-नियाज़ाना
न जाने क्यूँ मुझे अब के ही ना-गवार हुआ
हज़ारों हाथ मेरी सम्त एक साथ उठे
मगर मैं एक ही पत्थर में संग-सार हुआ
मैं तेरी याद में गुम था की खा गया ठोकर
ये हादसा मेरी राहों में बार बार हुआ
</poem>
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