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<poem>तुम्हें बाँध पाती सपने में!<br>तो चिरजीवन-प्यास बुझा<br>लेती उस छोटे क्षण अपने में!<br><br>
पावस-घन सी उमड़ बिखरती,<br>शरद-दिशा सी नीरव घिरती,<br>धो लेती जग का विषाद<br>ढुलते लघु आँसू-कण अपने में!<br><br>
मधुर राग बन विश्व सुलाती<br>सौरभ बन कण कण बस जाती,<br>भरती मैं संसृति का क्रन्दन <br>हँस जर्जर जीवन अपने में!<br><br>
सब की सीमा बन सागर सी,<br>हो असीम आलोक-लहर सी,<br>तारोंमय आकाश छिपा <br>रखती चंचल तारक अपने में!<br><br>
शाप मुझे बन जाता वर सा,<br>पतझर मधु का मास अजर सा,<br>रचती कितने स्वर्ग एक <br>लघु प्राणों के स्पन्दन अपने में!<br>साँसें कहती अमर कहानी,<br>पल पल बनता अमिट निशानी,<br>प्रिय! मैं लेती बाँध मुक्ति<br>सौ सौ, लघुपत बन्धन अपने में!<br>तुम्हें बाँध पाती सपने में!<br><br/poem>
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