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Kavita Kosh से
मन बैरागी हो गया, सपने हुए फ़कीर।
प्रणय-सिन्धु-तट पर खड़ा, ठोंक रहा तक़दीर।तक़दीर।। जब से उनको हो गया, मुझसे पूर्ण विराग।आँखों में सागर घिरा, हृदय आग- ही- आग।।
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