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|संग्रह=चीकणा दिन / मदन गोपाल लढ़ा
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<poem>
म्हैं आयो हूं-
सोधण सारू
बां पगां रा खोज
जका मंड्या
बरसूं पैलां
आं गळ्यां में
लाखूं लोग टिपग्या हुवैला
उण पछै तो
पण भळै ई पतियारो है-
कठैई तो लाधैला
अैनाण-सैनाण
उण जुग रा।

म्हारा ई खोज पण
मंड्या इण मारग
जातरा रै सरू में
जद सीख्यो ई हो चालणो।

म्हारो कौल हुवैला पूरो
ओ सहर!
सावळ अंवेर
उण जूनी ओळूं नैं।
</poem>
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