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'''ओ चम्पा की कली! '''
सच को झूठ के आवरण में लपेटकर
संसारी छलते रहे तेरा मन अपनत्व समेटकर
लघु तेरा जीवन
अचिर होकर भी तेरा चिर यौवन
स्वार्थी मानव ने नोंच डाला उसे भीभी।
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