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ताला-चाबी / नेहा नरुका

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<poem>
वह ताला थी
उसे उम्रभर अलग-अलग नाप की चाबियों ने खोलने की कोशिश की
पर वह न खुली ।

सालों-साल उसमें जंग लगती रही
सालों-साल एक पुराने मकान के सबसे भीतरी कमरे में
जहाँ न धूप थी, न बारिश, न हवा
वह लटकी रही ।

फिर एक दिन एक नई यौवन से मदमाती चाबी उसके पास आई
चाबी ने उसे पूरे उल्लास से खोला
वह खुलती गई, खुलती गई
वह खुल गई ।
</poem>
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