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Kavita Kosh से
ख़ुदी को मिटाकर
ख़ुदा देखते हैं ।
फटी चिन्धियाँ पहिने ,
भूखे भिखारी
फ़कत जानते हैं
तेरी इन्तज़ारी ।
बिलखते हुए भी
अलख जग रहा है
चिदानंद का
ध्यान-सा लग रहा है ।
तेरी बाट देखूँ , चने तो चुगा जा , हैं फैले हुए पर , उन्हें कर लगा जा ।,
मैं तेरा ही हूँ इसकी
साखी दिला जा ,
ज़रा चुहचुहाहट
तो सुनने को आ जा ।,जो तु यों इछुड़ने-बिछुडने लगेगा
तो पिंजड़े का पंछी
भी उड़ने लगेगा ।
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