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मरुत न रुका नभो मंडल में,
वह दौड़ा आया भूतल में,
नभ-सा विस्तृत, विभु सा प्राणद,ले गुलाब-सौरभ आँचल में-झोली भर-भर लगा लुटानेसुर नभ से उनरे गुण गाने,उधर ऊग आये थे भू पर,हरे राज-द्रोही दीवाने!तारों का टूटना पुष्प की--मौत, दूखते मेरे गाने,क्यों हरियाले शाप, अमरभावन बन, आये मुझे मनाने?चौंका! कौन?कहानी वाला!स्वयं समर्पण हारावह टूटा जी, जैसे तारा! तपन, लूह, घन-गरजन, बरसनचुम्बन, दृग-जल, धन-आकर्षणएक हरित ऊगी दुनिया मेंडूबा है कितना मेरापन?तुमने नेह जलाया नाहक,नभ से भू तक मैं ही मैं था!गाढ़ा काला, चमकीला घनहरा-हरा, छ्न लाल-लाल था!सिसका कौन?कहानी वाला!दुहरा कर ध्वनि-धारा!वह टूटा जी, जैसे तारा!
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