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Kavita Kosh से
ले गुलाब-सौरभ आँचल में-
झोली भर-भर लगा लुटाने
सुर नभ से उनरे उतरे गुण गाने,
उधर ऊग आये थे भू पर,
हरे राज-द्रोही दीवाने!