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निज मृत शिशु पर रख नमित माथ
:::बिखराती घन-केशान्धकार!!
जीवन है साँसों का छोटे छोटे--
:::भागों में चिर विलाप,
अब भार-रूप हो रही मुझे
:::मेरी आँखों की अश्रु-धार॥
वर्षा है, नभ औ’, धरा बीच
:::मिलने का है क्या बँधा तार?
नभ में कैसा रोमांच हुआ
:::बिजली का विचलित वेष धार!!
सुख दुख के चरणों से विशाल
:::करता है सम्मुख नृत्य कौन?
मैं भूल रहा हूँ; मेघ आज
:::रो कर कैसे है निराकार!!
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