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शकुन्तला / अध्याय 17 / भाग 2 / दामोदर लालदास

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की दिव्य विस्तृत अछि तपस्या-भूमि ई मनहारिणी।
तपसी अनेकहुँ ऋषि-महर्षिक शान्ति-सुख-संचारिणी।।
ऋषि कश्यपक आश्रम कोम्हर मातलि! कहू कोन ठाम अछि।
‘राजन!’ ऋषिक से आश्रमो देखू, केहन अभिराम अछि।।

राजन् चिरायुष्मान! देखु दृष्टि अपन उठायके।
थिर ठूठ व्क्ष-समान जे रवि दिशि स्वदृष्टि लगायकें।।
तपमे निरत छथि जे महा ऋषि सैह कश्यप मुनि महा।
जनिकर तनक अद्र्धाशपर वल्मीकवर देखू अहां।।

वक्षस्थल ऊपर जनिक केंचुल लसित वर-व्यालके।
लतिकादिकक झाड़ी सघन पर धरि लखू जट-जालके।।
निर्माण कयने नीड़ जाहि जाटक बिच विहगावली।
छथि सैह कश्यप ऋषि विलोकू दूर बेश तपस्थली।।

‘बड़ भाग्य वश हमरा सबहिं मातलि,एतय चलि ऐल छी।
अछि की रमनगर ई तपोवन ! दिव्यतम ई शैल की।।
ऋषि कश्यपक दर्शन महा मंगल-प्रदायक जानिकें।
रथ रोकु, उतरी हम एतहि दर्शन-शुभाशा ठानिकें।।

अपने अहां कनि जाउ, आज्ञा लाउ, जे दर्शन करी।
आदेश-प्राप्ति-बिना तहां गन्तव्य धु्रव वर्जन करी।।
ता हम अशोकक छांह पावन तर एतय बैसैत छी।
की अछि हरित झाड़ी अहा! आनन्द विव्य पबैत छी।।

‘राजन्, टहलि-फिरि देखु ता छवि तपवनक मनहारिणी।
की अछि अहा! आनन्दप्रद ई छवि-छटा शुभकारिणी।।
सुर-तरु-विपिनमे देखु, कत ऋषि लीन प्राणायाममे।
जे देखि उमड़य हृदयमे श्रद्धा अहा! प्रति याममे।।’

लखु स्वर्ण-पत-पराग-वासित सरक वारि रसालमे।
ऋषिगण करथि असनान-ध्यान प्रभात-सन्ध्याकालमे।।
नित बैसि रत्न-शिलाक ऊपर ऋषि-समाधि लगैत अछि।
रहि अप्सरागणहुक निकट मन हाथसँ न भगैत अछि।।

मातलि गेला कश्यप जतय प्रवचन विशिष्ट करै छला।
पातिव्रतक महिमा-कथा मां अदितिकें सुनबै छला।।
साष्टांग कयल प्रणाम मातलि भक्ति श्रद्धा-भावसँ
आदेश भेटल दर्शनक, प्रिय मातलिक प्रस्तावसँ।

ता नृप एतय बैसल प्रतीक्षामे समय बितबै छला।
नव-नव तपोवन-द्श्य लखि आनन्द बेश पबै छला।।
ऊठल फड़कि वसुधाधिपक दक्षिण भुजा तहि कालमे।
‘हे भुज! फड़कि की सुख देखयवह् तपक भूमि रसालमे।।

हम पुत्रहीन, प्रिया-बिछोहक ज्वालमे झुलसैत छी।
तहि चिन्तनेमे हम अहर्निश कष्टसँ बितबैत छी।।
गेली कहाँ उडि़के प्रिया? किछु टा पतो न पबैत छी।
की भुज! प्रिया-मिलनार्थ अति वेगें अहां फड़कैत छी।

एहि ठाम आशा की तकर ! नहि रेख मात्र पबैत छी।
ओ उडि़ गेली आकशमे कोन ठाम से न जनैत छी।।
ई हेमकूटक ऋषि-तपोवनमे तकर की आश हो।
सुख कोन दोसर शैलपर? जे देखि उर-उल्लास हो।।

एतादृशे चिन्ताक सिन्धु निमग्न वसुधाधिप छला।
भावीक गति-विधि गुप्तम, ककरा सुझय जगमे भला।।
भावी दुखक छन अपशकुन शुभप्रद शकुन सुख-कालमे।
नहि जानि, की सुख अछि लिखल एहि ठाम हमरा भालमे।।