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शकुन्तला / अध्याय 19 / भाग 1 / दामोदर लालदास

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लिअ, लिअ बाउ! आइ, हम लैलहुँ देरि न आबलगाउ।
ई शकुन्तलावण्य सँग मत भरि अँह आब खेलाउ।।’
सर्वदमन नहि एखन ततेटा शब्दक, अर्थक ज्ञाता।
तें सुनि कहल-‘कआँछकण्टला अथि? ऊँ! ऊँ! मोल माता?

से सुनि कहल मनहि मन भूपति-भल सुयोग भय गेले।
बिनु पुछनहँ शिशु मातृ-नामसँ धु्रँव दृढ़ परिचय देले।।
रे चित! हर्षित हो न एखन अति केवल नाम-पतासां।
होय एक नामक जगमे जन नहि दुई-एक पचासो।।

तत्क्षण ‘ई जननी नहि तोहर’ कहल तपस्विनि बाला।।
सुन्दर परम मयुर लखक हित कयल शोर एहि काला।
‘अं! अं!’ लेब लेब अम छुन्नल ओ मजुल छुक काली।
‘डें! डे!’ अमल मजूल केलायबा ‘-शिशू बाजल गुणशाली।

अस्तु, विनोदयुता से तपसिनि शीघ्र ताहि दय देले।
जे लय सर्वदमन नानाविधि मुद्रित करे अछि खेले।।
‘उल! उल!’ खनहि कहै अछि से शिशु राखि मनोरम आशा।
खनहि बजै अछि-‘नात! नत! श्रम देकब तोल तमाछा’।।

एतदनन्तर शिशुक हाथ दिशि दृष्टि विमल पडि़ गेले।
अकचकाय ते प्रथम तपस्विनि कहल-‘अहो! की भेले!
रक्षाबन्धन शिशुक हाथसँ ससरि खसल कोन ठामे।
हाय! आब तकरा के आनत ताकि महा दुखधामे?’

तक्षण नृप दुष्यन्त कहल सुनि -‘चिन्ता हा! नहि आनू।
यैह, यैह एहि ठाम खसल अछि राखी! झूठ न जानू।।
ई शिशु जखन मृगेन्द-शाव सँग मुदित करै छल खेले।
तैखन शुभ रक्षाबन्धन कर ससरि धरणिगत भेले ।।’

याबत युगल तपस्विनि बरजथि-‘हा! हां! से न उठाबी।
तबत नृप दुष्यन्त उठा’ पहिराय देल कर लाबी।।
से लखि सचकित युगल तपस्विनि रदनहि रसन दबौलनि।
चिन्ता खेद समेत महा अश्चार्य मानु प्रगटौलनि।।



नृप दुष्यन्त पुछल तपसिनिस तहि तथा तकालहिं।
‘कथि लय वर्जन-वचन सुनौलहुं? खेदहुँ कियै विशालहिं ?’
‘सुन-सुन, कहल तपस्विनि सरला भरि मन महा विषादे।’
‘एहि बन्धनक नाम अपराजित कश्यप-आशिर्वाद।।’

गुण सुनु तकर कहल कश्यप मुनि-जं धरणीगत हैते।
तं बालकक जनक, जननि तजि क्यो पहिराय न देते।।
जं क्यो आन उठा पहिराओत, तकर मृत्यु तकालहिं।
निस्सन्देह डंसत तकरा सुनु बनि वर बन्धन व्यालहिं।।

देखल हमरो सबहिं-आन जे जे जन लय पहिरौलनि।
व्याल-ग्रसनसँ कालग्रस्त भय जीवन अपन गमौलनि।।
से सुनि कहल मनहिंसन भूपति-रे चित! छोड़ दुराशा।
‘शुभ क्षण भेल समागत सद्यः पुरत मनोरथ-आशा।।

किन्तु आइ विपरीत क्रिया हम एहि राखीक देखै छी।
तें समोद परिचय बुझवा-हित साहस हमहुँ करै छी।।
सुनि सविनोद गिरा तपसिनिकें, कहल नृ पति सुखशाली।
‘की कहु देवि! अपन परिचय हम! अधम परम कृतिघाली।।’

पुरुवंशक अति धवल कीतिमे आगि लगाओल हमहीं।
आ अधर्म-पथ अवलम्बन कय प्रिया कनाओल हमहीं।।
दैवी कोनहुँ कुयोग वशें नहि चिन्हि बिसराओल हमहीं।
अति पवित्र तनिकर आत्मा पर वज्र पर वज्र खसाओल हमही।।

हम दुष्यन्त अनन्त दोषयुत कपटी कुटिल विकारी।
की कहु अधिक, कण्व-कन्याकें हमहि देल दुख भारी।।
कोन भूत योगिनी चढ़ल छल सिरपर से नहि जानज।
व्याह धरिक सँस्मरण भेल नहिं, कटु कहि कत अपमानल।।

अस्तु, असत्यताक की सम्भव श्रीकश्यपक सुवाणी।
सत्य, सत्य सभकाल सत्य अछि सभविधि हे कल्याणी।।
पापी पिता ह्महि सुत-रत्नक, डसलक तें न भुजंगो।
देल बान्हि रक्षाबन्धन तें देखल न सँपक्र रंगो।।

से सुनि कथा कहल अन्यासँ प्रथम तपस्विनि नारी।
‘बड़ आनन्द तथा सौभाग्यक आइ सुदिन सुखकारी।।
पतिक विरइ-ज्वालामे औखन झुलसित छलि जे रामा।
विधि अनुकूल, आइ विरहक भेल अन्त, परत मन कामा।।

आइ शकुन्तलाक जीवन-धन छथि आयल एहि ठामे।
चलु, ई शुभ-सँवाद सुनाबक हेतु ताहि अनुपामे।।
हे सुव्रते! तय नहि क्षणहुँक आब करक थिक देरी।
विरह-विदग्ध मैनकेयीकें सुचा दी आइ सबेरी।।

बितल चक्रवाकीक विरह-निशि सुप्रभात भय आयल।
आश-अकाशक क्षितिज-कोरसँ शुभ दिनमणि बहरायल।।
मधुर मिलन, चकवा-चकवी हंसि-खेलि सरोवर-विहरी।
कुहुकि-कुहुकि आमोद-सरोजक वनमे मधुरम झहरी।।

प्रिया-वियोमक जलद घटा-तरसँ नृप-आशक चन्दा।
मुस कति-हंसति प्रकाश पसारित बहरल जनु सुख-कन्दा।
छिटकल विगत कथा परितापक तारावलि किछु मन्दा।
पीयर आश-लता जतबा छल हरित भेल सानन्दा।

हर्षित भेलि सुनाय सुधा-सम समाचार सुखकारी।
नृप दुष्यन्तक निकट अनै छथि युगल तपस्विनि नारी।।
निज दुर्दीन तथा दुर्देवक कठिन महा बुझि रोषे।
अहा! शकुन्तलाक मनसे नहि छल दृढ़ मिलन-भरोसे।।

किन्तु सर्वदमनक रक्षा-बन्धनक रहस्य विचारी।
आशा-शशिक उदय होइत छल, हीतल शीतलकारी।।
कठिन विरह व्रत जनित वेदनासँ अंगावलि क्षीणा।
वेणी एक मात्र मस्तकपर, कान्ति सवस्त्र मलीना।।

एतय प्रमोद-सँग भूपतिकें बढ़इछ पाश्चातापे।
सुमिरि-सुमिरि गुर्विणी प्रिया-परित्याग वार्तालापे।।
सकल शोक-जालक घालक अछि बालक यद्यपि कोरे।
तदपि प्रजा सुरगण-चिन्ताहर भूपति चिन्ति घोरे।।

बाजथि स्वगल खनहुँ नृप ‘हा’! ‘हा’! कयल केहन हम काजे
जे मन पडि़तहिं एखन आइ अत्यन्त रहल बढि़ लाजे।।
कोन मूह लय प्राणप्रिया लग ठाढ़हुँ होयब हा! हा!
की साहस लय खोलि सकब मुख! प्रीतिहि कयलहुं स्वाहा।।

तक्षण उतरि कोरसँ बालक बाजल-‘आब न लोकू।
अमले लेमक हेतु अबै अछि माता हमल विलोकू।।
देखल भूपहुं बढ़ल पुनः उर ग्लानि तेक विशाले।
परम चेतनाहीन जाहिसँ महि खसला नरपाले।।

किछुक कालमे जखन चेतना भेल नृपतिकें थोडे़।
पौलनि निजकें तय महीपति प्रिय प्राणेशिक कोरे।।
अश्रु-भरल लोचनसँ लगला कहय तखन दुष्यन्ते।
‘प्रिये! कयल अपमान अहंक हम भ्रमवश पूर्व अनन्ते।।

किन्तु आब भ्रम-मोह-दिवस हम सुनु, सभ भांति गमोलहुं।
धन्य भाग्य जे आइ अँहक ई मुख-दर्शन-सुख पौलहं।।
चन्द्रक जखन नष्ट भय जाइछ ग्रहणरूप परितापे।
तखन यथा तनिका रोहिणियं होइछ मधुर मिलापे।।

से मुनि वचन प्राण प्रियतमके प्रेमानन्द-विभोरे।
कण्व-सुता बस-‘आर्यपुत्रके.....’एतबहि कहल सनोरे।।
‘जय हो’ हा कहि सकलि न गद्गद-कण्ठ, रूद्ध छल वाणी।
किन्तु कहल दुष्यन्त-‘आइ से जय पाओल, कल्याणी।।’

हमरहिं कारण सहल विविध दुख दुस्सह अहां अपारहिं।
पुष्ट अंग हा हा! दुबरायल विरह-व्रतें विस्तारहिं।
हाय! कतय से विकच कमल सन कान्ति तनक चल गेले।
अहह! अहह! प्राणशि! अहांकें हम दुख दारुण देले।।

भ्रमवश अँहक त्याग हम कयलहुँ, व्यंग्यक तहु कथे की।
यथा अन्ध मणिमालहुकें बुझि व्याल दैछ झट फेकी।।
से सभ दोष क्षमा करु सुन्दरि! विसरि हमर अपराधे।
छल दुर्भाग्यवशात् वज्र वाणी! छल अपन न साधे।।

करु करुणा करुणामयि! जीवन-सँगिनि! प्राणाधारे!
ई पापिष्ठक एकमात्र बस, अहिं कारिणि उद्धारे।।
से कहि विकल कनैत प्रिया-पद-पंकजपर नरपाले।
खसि पड़ला, निश्चेष्ट परम सन कहइत-बाले! बाले!!

ई दयनीय दशा नाथक लखि पति-परायणा नारी।
कनइत कहल-‘उठू! उठू!’ प्रियतम! धरि भुज युगल बिथारी।।
प्राणधार! करिय चिन्ता जनि, अँहक न स्वल्पहुं दोषे।
छल हमरहिं पूर्वक पापक फल उदित, कुदैबक रोषे।।

छल न भरोस प्रभुक पद-पंकज पुनि देखब सुखदाता।
किन्तु, आई दिन धुरल सुभाग्यक, धनि-धनि! धन्य विधाता।।
से कहि निर्मिमेष लोचनसै से सौभागिनि नारी।
प्राणपतिक चन्द्रानन देखथि हीतल शीतलकारी।।

लोचन-युग भूपहंक प्रिया-दर्शनक पियासल घोरे।
लागल दृढ़ भय पीबय प्रिया-मुख पतक मधु वरजोरे।।
भय सन्तप्त प्रखर रवि-करसँ तृषित यथा युग घोड़ा।
नदी देखि किछु दाब न मानय, पीचल जल, खा’ कोड़ा।।

क्षण उपरान्त कहल जल-लोचनि-प्राणनाथ! सुखराशी।
कोना-कोना कहु, मन पडि़ आयल ई अधमाघम दासी?
भुपति कहल-‘थम्हु, थम्हु, सुन्दरि! से ता नहि कहि हैते।
जा’ उरसँ कण्टक परिवापक बाहर भय नहि जैते।।

से कहि नृपति महा शोकाकुल परम मधुर वाणीसँ
पोछल प्राणप्रियाक नयन-जल प्रीति-पूर्ण पाणीसँ।
नृप कर देखि सुरत्न-मुद्रिका से सुमुखी मृगनैनी।।
प्राणनाथसँ पुछल उदासीना भय कोकिल-बैनी।।