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शकुन्तला / अध्याय 1 / भाग 2 / दामोदर लालदास

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श्वेत सरोजक आसन ऊपर बैसलि मंजु बजाबति वीणा।
श्वेत दुकूल समावृति अंगहुँ श्वेत सूरत्नक हार नवीना।।
श्वेतहिं फूल चढ़ा पद पूजथि विष्णु विरंचि सुरेन्द्र प्रवीणा।
गीत, कला, कवीता वर बाँटथि सप्त स्वरें झनकाय स्ववीणा।।

से करुणामयि माँ वरदायिनि एकरती एम्हरो दृग फेरथु।
काव्यकलाक मनोहरता, प्रतिभा-रमणीयक रत्न बिखेरथु।।
दै चरणाम्बुज के मकरन्दक धूलि उठा कर-मस्तक फेरथु।
दिव्य त्रिलोकक से जननी प्रिय माय जकाँ हमरो दिशि हेरथु।।