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शकुन्तला / अध्याय 2 / भाग 2 / दामोदर लालदास

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एतदनन्तर मध्य मेनको तहि तपवन बिच आइलि।
की अनुपभ लावण्य मनोरम! वाणी वेश रसाइलि।।
सुन्दरतामे रति छकित छलि? रत-रत कोमल अंगे।
विनुहिं कटाक्ष-पातसँ जे कर मुनिहुँक मनकें भंगे।।

से उन्मद मद-मथनिहारि, मन्मथहुक मुनि लग जाक।
मनहर वीणानाद-विनिन्दक मधु सँगीत सुनाक।।
हाव-भाव-लीला-लावण्ये से श्रृंगारागारा।
ध्यान-लौह-आकर्षित कयलनि निज स्वर-चुम्बक द्वारा।।

टुटल मुनिक ध्यान, बस, छुटल तपनिष्ठा अति भारी।
लोचन फुजल, मेनका-कोइलि-कुहुकि उठलि मनहारी।।
लीला, नृत्य, मदन-मद-मातलि, नव तारुण्य निहारल।
तपनिष्ठता, समाधिक दृढ़ता, मुनिवर सकल बिसारल।।

काचिंनि-भृकुटि-धनुष पर शोभित गुण भल कज्जल रेखा।
मधुर हास युत वचन-सुमन-शर छुटय के कर लेखा।।
समर-बाणसँ बरु जन बाँचथि, यद्यपि वज्र-समाने ।
पर. कन्दर्पक कुसुम-शरें के बंचला बीर महाने।।

अस्तु, मेनका-नयनक शरसँ, मदनक सुमनक शरसँ
बाँचि न सकला विकट तपोधन कौशिक शरक-प्रखरसँ।।
मदनदेव, रमणिक छल-बलसँ जनमलि सुन्दरि कन्या।
नामकरण तकरे ‘शकुन्तला’, भेलि महाछवि-धन्या।।

अमरावतिक अमरगण देखल-‘मुनिक छुटल तप पक्का।
भय पुलकित करतल सुर पीटल, मारल इन्द्र ठहक्का।।
धन्य मेनके! धन्य मेनके! धनि भन्मथ! शर-भारल।
तपोभ्रष्ट कय देल मुनिक सुरगणहुक कांट उखाड़ल।।

गदगद भेलि मेनका मुनि सुरपतिसँ अपन बड़ाई।
मदनहुँ अति सन्तुष्ट श्रवणगोचर कय अमित बधाई।।
सुता राखि मुनिवरक कोरमे रमणि इन्दपुर आइलि।
सिद्ध भेल सुर-कार्य सुमिरि से हर्षक सिन्धु समाइलि।।

एतय देखि मुनि कुसुम-कली-सम देव-अलौकिक कन्या।
लेल दृष्टि-मुख फेरि घृणासँ, राखि ततहिं छवि-धन्या।।
चलला विपिन-खण्ड दोसर दिशि, करइत पश्चात्तपे।
हा! तप-योग नशाय भोग अपनाय कयल बड़़ पापे।।

कौशिक पिता, मेनका माता दुहु कन्याकें छोड़ल।
पड़लि देखि पक्षी शकुन्त निज पंख पसारि अगोरल।।
क्रन्दन-ध्वनि सुनि शिशुक कण्वमुनि एक तपोव्रत-चारी।
कोर उठाय अपन तप-वनमे आनल धर्म विचारी।।