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शकुन्तला / अध्याय 6 / भाग 1 / दामोदर लालदास

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ईदृश चिन्तातुरहिं रहथि नृप उत्कण्ठितचित भेल।
बेश विलक्षण कौतुक वनमे ताहि काल भय गेल।।
कमलमुखीक वदनमण्डल पर एक भ्रमर झट आबि।
लागल मधुरस पिबय मुग्ध भय भन-भन स्वरसँ गाबि।।

पाणि-पद्मसँ यदपि पद्मिनि तकरा देथि उड़ाय।
ढीठ भ्रमर तैओ पंकज मधु लपकि-झपकि पिबि जाय।।
खन अलि दौडि़ अधर-मधुचूसय खन उडि़ चुमय कपोल।
श्रवण निकट खन आबि करैछल भन-भन शब्दक घोल।।

अस्तु, भेलि व्याकुल से भोड़थि लोचन वारंवार।
त्रास-व्याजसँ मानु सिखैछलि भू्र-कटाक्ष-सँचार।।
कौखन चैंकि उठथि आँचर लए उड़वथि खनहुँ मिलिन्द।
किन्तु, छोडि़ नहिं सकय भ्रमर से रसिक वदन-अरविन्द।।

एतय देखि नव ई अलि कौतुक तनिक विकलता सँग-
नृपक हृदय-सागरसँ उछलल हर्षक तुंग तरंग।।
लगला कहय मनहिं मन-‘तोहर रे अलि! भाग्य महान।
दुर्लभ हिनक सरस अधरामृत मुदित करैछह पान।।

उडि़ सरोज नयिनिक छुबइत छह चंचल नयनक कोर।
धन्य! धन्य! मधुकर! सत्ये सुनु, जन्म सफल अछि तोर!!
उड़बय हेतु उठाबथि यावत से तरुणी कर-कंज-
मधुरस लय उडि़-उडि़ करइत छह ताबत गुन-गुन गुंज!!

रस-रत्नक तों चतुर पारखी आइ जानि हम लेल।
सरस-सुमन-मधु जानि निरस अलि! मुख-रसपर खेल।।
जनइत छलहुँ सुरस चीन्हय नहि, मधुकर हो हतज्ञान।
बुझलहुँ आइ भ्रमर! हमरे छल से भ्रम सकल निदान।।

हम त ‘जाति-पाति-चिन्तहिमें छी बैसल तल्लीन ।
किन्तु, मधुप! तों अधर-सुधा-मधु-पान-प्रमत्त प्रवीण।।
ओम्हर अकछ भेलि से पद्मिनि मधुकरसँ बड़जोर।
मोरि वदन-मण्डल, पाछाँ हँटि, कयल सखीगण शोर।।

बचा! बचा! सखि! हठी भ्रमरसँ बचा! बचा! सखि! सखि! आबि।
देख! देख! ई मधुप उपद्रव! मुख पर भन-भन गाबि।।
तों सभ तरह हमर हितकारिणि, आ! आ! कर हित मोर।
व्याकुल कय, नहि तें ई मधुकर लेत प्राण बरजोर।।

उत्तर कहल सखीगण मुसुकति की मधुवाणि बजैत।
की सामथ्र्य हमर रक्षा हित नृप दुष्यन्त अछैत।।
करथुन त्राण सैह पृथिवीपति जनिक थिकनि ई राज।
दोसर ककर प्रताप तेहन अछि, जे कर रक्षण काज।।

सुनि अभीष्ट वाणी बहरैला तरुक ओटसँ भूम।
दय ललकार बेश कटगर तैंह कहल समय अनुरूप।।
बस, बस पुरुवंशीक रहत जग याधरि तिलभरि प्राण।
ताबत ककर दर्प जे तोड़त प्रजा-शान्ति कल्याण।।

अछि समग्र वसुधाक शासनक जकरा ऊपर भार।
तकरा जिवइत करत तपोवनमे के अत्याचार?
कोन दुष्ट, मुग्धा तपस्वि कन्याके दै अछि कष्ट?
एखन तकर करब हम शासति अथवा प्राणहि नष्ट।।

सखिगण चैंकि देखि नृपवरके आगत-तपवन-द्वार।
आसन जल दय, कयल स्नेहयुत तनिक मधुर सत्कार।।
कुशल पुछल, उत्तर शुभ भेटल, भेलि सबहुँ सन्तुष्ट।
परिचय किन्तु, समग्र बुझव हित, फेर पुछल रव-पुष्ट।

कतेक प्रजाकें छोडि़ विरहमे व्याकुल कैल प्रयाण?
कोमलांग! वन आबि कयल पीडि़त किये अंग महान?
यदि श्रम अधिक होय नहि तें सुनु कोमलांग सुकुमार।
कहि उत्तर सदया ठण्ढा करु उत्कण्ठा विस्तार।।

उत्तर तकर कहल नृप तत्क्षण-‘कियै करब किछु लाथ।
पुरुवंशी नृप सम्प्रति सौंपल शासन हमरहिं हाथ।।
तें मुनिगणक हँटावक कारण सकल प्रकारक क्लेश।
सुन्दरि! आजु आबि हम गेलहुँ पुण्य तपोवन देश।।