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शकुन्तला / अध्याय 9 / भाग 2 / दामोदर लालदास

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प्रिय-विरहें अछि जाहि न लेशहुँ देह-दशाहुँक ज्ञाने।
की आश्चर्य ताहि यदि हो नहि अन्यागमनक ध्याने।।
यदपि पवन कत बेरि जगाओल खिचि-खिचि अंगक चीरे।
किन्तु जागि नहि सकलि तथापिहुँ, रहलि बिसुधि सन धीरे।।

छलि प्रियतमक निकट मुखचन्द्रक ध्यानहि भेलि चकोरी।
तखन कोना किछु जानि सकै छलि प्रिय-पति प्रीति-बिभोरी।।
किन्तु तथापि बुझल दुर्वासा अपन महा अपमाने।
क्रोधाधिक्य रहय देलक अछि ककरा सुस्थिर ज्ञाने?

मानस हो दस-बीस न ककरो, मानस होइछ एके।
से मानस प्रिय पतिक निकट छल, तखन कोना किछु देखे।।
ज्ञानी छला, लितथि बुझि यदि ऋषि बेटी अबुध दुलारी।
अपमानक अपराध बिसरि क्षमितथि ऋषि विज्ञ विचारी।।

किन्तु विश्वविश्रुत क्रोधी ऋषि क्षमा-विचार न जानल।
तम-तम तम-तम करति क्रोधसँ क्रोधक भृकुटी तानल।।
तमकि त्वरित अधरो पटपटबति, उठा सजल कुशपाणी।
बजला शापक हृदय-विदग्धक केहन बज्र सम वाणी।।

‘जकर ध्यानमे भेलि निमग्ना दृष्टि एम्हर नहि लैलिं।
विश्व-विदित क्रोधी मुनि बुझितहुँ हमर न स्वागत कैलें।।
से दुष्यन्त तेहन भय बिसरत तोहि अभिमानिनि वामा।
यथा मत्तजनकें न पड़य मन पूर्व क्रिया अभिरामा।।’

मन नहिं पड़त ब्याह स्नेहादिहुँ! हैत विफल सभ आशा।
बस, ई शाप असत्य न होयत, नाम हमर दुर्वासा।।
उच्चस्वरें बजैत बचन ई शापक-भृकुटि चढ़ौने।
घुरि-घुरि पाछु तकैत जाइ छथि लम्बित डेग बढौने।।

मुनि-मुख-निर्गत शाप-कथा ई क्रोध-प्रपूर्ण अपारा।
खसल धरापर जनु वाताहत घनसँ उपलक धारा।।
उच्चहि स्वरहि कहल यद्यपि मुनि वज्र सनक ई वाणी।
किन्तु तथापिहुँ जागि सकलि नहि ध्यान-रता कल्याणी।।

वर्षाकाल यथा प्रिय चन्द्रक दर्शन-रता चकोरी।
कड़क-तड़क जलधरक सुनय नहि प्रियतम-प्रीति-बिभोरी।।
सुनल युगल सखि विपिन-खण्डसँ शाप-गिरा गम्भीरे।
दौडि धाइँ दय खसलि मुनिक पद पंकज उपर अधिरे।

लपटि गहल युग चरण सरोदन पूर्ण विलाप-कलापे।
किन्तु हाय! नहि सखिक सकलि हरि सकल शोक-सन्तापे।।
युगल सखिक सुनि क्षमा-प्रार्थना देखि तथा दृढ़ प्रीती।
भय किछु मात्र शान्त से मुनिवर कहल कथा एहि रीती।।

‘अपन देल औंठी देखत जैखन से नृप दुष्यन्ते।
तैखन ताहि सकल सुधि आओत, होयत शापक अन्ते।।
प्रिया-मिलन-हित बढ़त लालसा, हैत मिलन-सुखकारी।
वातावरण बदलि सभ जायत दहुक वियोगक भारी।।