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शब-ए-फुरकत किसी सूरत ही गुज़ारेगी हमें / पुष्पराज यादव

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शब-ए-फुरकत किसी सूरत ही गुज़ारेगी हमें
करवटें बदलेंगे और नींद न आयेगी हमें

उम्र दर उम्र चलेगा ये वफ़ा का किस्सा
उम्र दर उम्र कोई बात कचोटेगी हमें

ये अनासिर का बदन ख़ाक में मिल जायेगा
और ये दुनिया इसी दुनिया में तलाशेगी हमें

चाहती है कि मुझे जिस्म से हो उसका ख़याल
हाँ वही लड़की जो बोसा भी नहीं देगी हमें

याद-ए-जानां की कसक और ये सुनसान सड़क
कौन जाने कहाँ किस मोड़ पर लायेगी हमें

शहर-ए-उल्फत में कोई ख्व़ाब-जदा दोशीजा
हाय कह-कहके ही दीवाना बना लेगी हमें