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शरशय्या / तेसर सर्ग / भाग 12 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

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देख पड़ल कते नृप् लोक।
व्यर्थ होए की कएने शोक।।61।।
कारण सबहक एके जानु।
मानवके तँ मानव मानु।।62।।

मनुसन्तानक एके धर्म।
सहपालनमे राखल मर्म।।63।।
सहभोजन सहजीवन कर्म।
असह असह थिक सतत अधर्म।।64।।

अनुभव अपन देल हम राखि।
सूनल जे छल देलहुँ भाखि।।65।।
परनिन्दा नहि थिक कर्त्तव्य।
ऋण आनक थिक नित दातव्य।।66।।

बुझु अपनाके नहि उच्च।
शेष जगत नहिं मानु भुच्च।।67।।
उच्च नीच मानवके आनि।
विधि नहि कथमपि भेद बखानि।।68।।