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शरशय्या / दोसर सर्ग / भाग 13 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

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हरि प्रसन्न भए कएल तनि
भक्तिभाव स्वीकार।
सोचल गँगातनय तत
युद्धक काज असार।।76।।

वश कर्त्तव्यक वनल ओ
कएलन्हि तदपि प्रहार।
हरि जत तत के कए सकए
शर गाण्डीव निवार।।77।।

सावधान भए योगबल
देखल निधन समीप।
खसला बुध कुरुक्षेत्रमे
कुल-मणि-जातमहीप।।78।।

सबतरि हाहाकारसँ
भेल दिशा परिपूर।
पहुँचि गेल सब छोड़िके
रिबत हस्तिनापूर।।79।।

कौरब पायण्डव मीलि कए
धएल हुनक बरगात।
छल अमूल्य सम्पत्ति सीक
निर्विवाद अवदात।।80।।

पूर्ण चेतना धारिके
जीवित छला कुलेश।
चिन्तन सभ जन करथि तत
हटत कोना हुनि क्लेश।।81।।