भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

शौक़िया कुछ लोग चिल्लाने के आदी हो गये / डी. एम. मिश्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

शौक़िया कुछ लोग चिल्लाने के आदी हो गये
पर, यहाँ अफ़वाह फैली लोग बाग़ी हो गये।

महफ़िलों में आ के खु़ददारी बयाँ करते रहे
पर, सरे बाज़ार बिक जाने को राज़ी हो गये।

सिर्फ़ सत्ता का उन्हें सुख चाहिए, फिर कुछ नहीं
कल तलक वो साइकिल थे आज हाथी हो गये।

ले गये बच्चों के मुँह का जो निवाला छीनकर
आँकड़ों के खेल में वो प्रगतिवादी हो गये।

वो अगरचे लूटता है तो बुरा क्या है मगर
उठ पडे़ मज़दूर तो आतंकवादी हो गये।

ओ मेरे तालाब की भोली मछलियो सावधान
ये वही बगुले हैं जो कहते हैं त्यागी हो गये।