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सामान्या बरनन / रसलीन

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1.

भावै सबही के पूरे करे काज जी के,
धनी उर बसे नीके उरबसी बनी है।
रूप सुबरन एक रति हू न पूजे नेक,
धनी है मनी अनेक जाके आगे भनी है।
दीखै जोर तन कोटि खान रसलीन जोति,
सोई कै सु पट ओट दीपक लौं छनी है।
आनन सरस बेधे पाहन से प्रान घने
देखत के नैन यह हीरा की सी कनी है॥45॥

2.

बसन बसाइ लट आनन में लटकाइ,
काजर लगाइ चख, पान मुख खाइ के।
ताल झनकाइ बीन मृदंग मिलाइ नृत
कारिन बुलाइ सुभ संगति रचनाइ के।
हाथन उठाइ कटि ग्रीव लचकाइ दोऊ
भौंहन नचाइ अति नैन मटकाइ के।
नूपुर बजाइ जब भाय सो धरत पाँव
लागत है गति आइ तेरे पग धाइ के॥46॥

3.

सुंदर सुरूप रसलीन है अनूप अति,
मेनका के रूप मोहै भूप सुरपति को।
तान की तरंग संग मृदंग ध्रतंग अंग,
किन्नर गंधर्ब की करत भंग मति कों।
तीछन कटाच्छ अच्छ हाव भाव लच्छ लच्छ,
देखि कै प्रतच्छ भूली भारती सुरति को।
भनत बनत न निकाई तेरी संगति की
पति गति देते तेरे पग पति गति को॥47॥

4.

लागी रहै ऊ अगौन निस दिन जाके भौन,
पाइन की बनी जौन कैधौं गढ़ी जूप की।
छनक न छूटै जग हन हन कोटि कीन्हों,
टूटै औ न फूटै पतरी ज्यो गंदे कूप की।
स्वेद से पसीज रही काम जल भींज रही
निपट गलीज ऐसी जैसी नादी धूप की।
कहाँ लौं बखानौं रसलीन उपमान कोऊ
आनो बीसवा की चढ़ी मानो खाक रूप की॥48॥