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सुना है मगर ये हक़ीक़त नहीं है / डी. एम. मिश्र

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सुना है मगर ये हक़ीक़त नहीं है
उन्हें अब हमारी ज़रूरत नहीं है

अगर जम गये पंख हैं तो उड़ें वो
हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है

बहुत व्यस्त हैं खुद के धंधों में अब वो
हमारे लिए उनको फ़ुरसत नहीं है

पिता से अलग खुद की दुनिया बसायें
ये बेटों का मन है बग़ावत नहीं है

तअल्लुक़ नहीं अब रहा कोई बेशक
मगर उनसे कोई अदावत नहीं है

मेरे फ़ैसलों में दख़ल दे कोई क्यों
किसी मशवरे की ज़रूरत नहीं है

किसे बख़्शता है समय याद रखना
ये दिल की कसक है नसीहत नहीं है