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सुन्दर-सा कमरा साफ देखकै आईए / दयाचंद मायना

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सुन्दर-सा कमरा साफ देखकै आईए...टेक

अलबत मैं तै कमरे का पिया, पूर्व सूही द्वार हो
ऊठते ही दर्शन मिलज्या, सूर्य का दीदार हो
दरवाजे के सामने, एक गुलशन की बहार हो
दो सौ गज के ऊपर कुंआ, लोवै सी बाजार हो
साठ कदम पर मन्दिर अन्दर वेदों का प्रचार हो
शब्द भजन के गावण आला, आच्छा सा कलाकार हो
भगती पूजा-पाठ और तप-जाप देखकै आइए...

अमीरां के दूर घर, गरीबां का पड़ौस हो
हाथी कैसी शान्ति और शेर कैसा जोश हो
उन गरीबां के ऊपर किसे, ठाडे की ना धोंस हो
बेईमान कलियारां धोरै, बसण म्हं भी दोस हो
भीतर तै रंग काला सारा, ऊपर धोल पोस हो
सच्चे मनुष्य देखकै आईए, बेईमाना सौ कोस हो
गली मोहल्ला हिर-फिर कै, पुन्न पाप देखकै आईए...

मेल जोल और प्रेम देखिए, आपस के म्हं सूत हो
इसा मोहल्ला चाहिए, जहाँ मनुष्य की जरूत हो
भला के घर नेड़ै टोईए, दूर बसता ऊत हो
पति और पत्नी मैं टोईए, प्यार मजबूत हो
सावित्री सी देवी चाहिए, श्रवण जैसा पूत हो
चन्द्रवती उदालक से, माँ-बाप देख कै आइये...

आजू-बाजू बसणियां की साफ-सुथरी नीत हो
जाण और बेजाण से भी, एक सी प्रीत हो
ठाली मन बहलावण नै और गावण नै संगीत हो
सभा के मैं माणस कोए, बैठा ना पलीत हो
बोलण में प्रेम भरा और मीठी बातचीत हो
परख लिए ‘दयाचन्द’ छनद की कवित्त हो
लय रंगत सुर ताल मूल की थाप देखकै आईए...