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हर शख़्स के दामन यूँ कभी चाक नहीं थे / सिया सचदेव

हर शख़्स के दामन यूँ कभी चाक नहीं थे
हालात कभी इतने ख़तरनाक नहीं थे

ये आजकल के बच्चे हैं इनकी न पूछिए
पहले के जो बच्चे थे वो चालाक नहीं थे

कुछ तल्खियों ने बदला हमारे मिज़ाज को
पहले कभी हम इतने तो बेबाक़ नहीं थे

जिनपे लगे इलज़ाम फ़सादात के लिए
मासूम थे वो शख़्स ख़तरनाक नहीं थे

इंसानियत का जिसको सलीक़ा नहीं आया
गंगा में नहाकर भी कभी पाक़ नहीं थे

माना की तेरे सामने हस्ती मेरी नहीं
राहों की तेरे हम भी मगर ख़ाक नहीं थे

माना की ज़माने को सिया ग़म नहीं मेरा
मरने पे मेरे तुम भी तो ग़मनाक नहीं थे