भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

101 से 110 तक / तुलसीदास / पृष्ठ 4

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पद 107 से 108 तक
 
(107)

है नीको मेरो देवता कोसलपति राम।
सुभग सरारूह लोचन, सुठि सुंदर स्याम।1।

सिय-समेत सोहत सदा छबि अमित अनंग।
 भुज बिसाल सर धनु धरे, कटि चारू निषंग।2।

बलिपूजा चाहत नहीं , चाहत एक प्रीति।
सुमिरत ही मानै भलो, पावन सब रीति।3।

देहि सकल सुख, दुख दहै, आरत-जन -बंधु।
गुन गहि, अघ-औगुन हरै, अस करूनासिंधु।4।

 देस-काल -पूरन सदा बद बेद पुरान।
सबको प्रभु, सबमें बसै, सबकी गति जान।5।

को करि कोटिक कामना , पूजै बहु देव।
तुलसिदास तेहि सेइये, संकर जेहि सेव।6।

(108)

बीर महा अवराधिये, साधे सिधि होय।
सकल काम पूरन करै, जानै सब कोय।1।

बेगि, बिलंब न कीजिये लीजै उपदेस।
 बीज महा मंत्र जपिये सोई, जो जपत महेस।2।

प्रेम-बारि-तरपन भलो, घृत सहज सनेहु।
संसय-समिध, अगिनि-छमा, ममता-बलि देहु।3।

अघ -उचाटि, मन बस करै, मारै मद मार।
आकरषै सुख-संपदा-संतोष-बिचार।4।

जिन्ह यहि भाँति भजन कियो, मिले रघुपति ताहि।
तुलसिदास प्रभुपथ चढ्यौ, जौ लेहु निबाहि।5।