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दाबि-दाबि छाती पाती-लिखन लगायौं सबै
ब्यौंत लिखिबै को पैं न कोऊ करि जात है ।
कहै रतनाकर फुरति नाहिं बात कछु
हाथ धरयौ हीतल थहरि थरि जात है ॥
ऊधौ के निहोरैं फेरि नैंकु धीर जोरैं पर
ऐसे अंत ताप कौ प्रताप भरि जात है ।
सूखि जाति स्याही लेखिनी कै नैंकु डंक लागै
अंक लागैं कागर बररि बरि जात है ॥99॥