फूल तू झूल रहा एकाकी
साथी तरु शाखा के तेरे रहे न कोई बाकी
छिटकी चारु-चन्द्रिका चहुँ दिशि
उपवन में एकाकी
दिखलाता तू किसे निभृत में
अपनी बाकी झांकी
मस्त आप अपने में ऐसा
छिपा कहीं था साकी
बंध वृन्त से टूटेगी कब
यह डोरी ममता की।
फूल तू झूल रहा एकाकी
साथी तरु शाखा के तेरे रहे न कोई बाकी
छिटकी चारु-चन्द्रिका चहुँ दिशि
उपवन में एकाकी
दिखलाता तू किसे निभृत में
अपनी बाकी झांकी
मस्त आप अपने में ऐसा
छिपा कहीं था साकी
बंध वृन्त से टूटेगी कब
यह डोरी ममता की।