भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

उतरते हुए / रमेश रंजक

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 13:27, 26 दिसम्बर 2011 का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दिन के ऊँचे पहाड़ से
उतरते हुए धीरे-धीरे
एड़ी से कानों तक
बज उठे मँजीरे

जेबों में सरकारी झिड़कियाँ लिए
घूमते रहे
महँगी पोशाकों के बग़ीचे में आहिस्ते
हम टूटी टहनी-से झूमते रहे
कितनी कमज़ोर हीन भावना लिए
ठहरते हुए धीरे-धीरे

चेहरे से पाँवों तक
ठहर-ठहर कर
एक टेप चिपकती गई
आँखों के भीतर की आँख
बूँद-बूँद टपकती गई
कौन हाथ बीनें वे हीरे
                      धीरे-धीरे