भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"कन्याकुमारी : सूर्योदय : सूर्यास्त / दूधनाथ सिंह" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
छो
छो
 
पंक्ति 2: पंक्ति 2:
 
{{KKRachna
 
{{KKRachna
 
|रचनाकार=दूधनाथ सिंह
 
|रचनाकार=दूधनाथ सिंह
|संग्रह=एक और भी आदमी है / अचल वाजपेयी
+
|संग्रह=एक और भी आदमी है / दूधनाथ सिंह
 
}}
 
}}
  

15:36, 27 अक्टूबर 2007 के समय का अवतरण

काले समन्दर में अचानक एक लाल स्तम्भ उगता है ।

लहर-लहर मारती है गैंती--टूटकर फैलता है लाल रंग

एक ग़ुस्सैल इशारे की तरह

तमतमाता हुआ सूरज

उठता है : गिरता है


काला समन्दर फिर

अपना वही अट्टहास-- शुरू करता है


लौटते हैं हम चुपचाप ।


शुरू होती है कविता फिर

एक चीख़ की मानिन्द ।