भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

हलवा-पूरी / प्रकाश मनु

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 16:50, 16 फ़रवरी 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=प्रकाश मनु |अनुवादक= |संग्रह=बच्च...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सब पर अपना रोब जमाते
नन्हे-मुन्ने चिंटू जी।

भैया से अब्बा करते हैं
दीदी से करते हैं कुट्टी,
पापा से कहते हैं-मेला
दिखलाओ जी, कल है छुट्टी।
कैसे-कैसे दावँ चलाते
नन्हे-मुन्ने चिंटू जी!

हलवा-पूरी जी भर खाते
या फिर बरफी पिस्ते वाली,
रसगुल्ले जब आते घर में
आ जाती चेहरे पर लाली।
धमा-चौकड़ी खूब मचाते
नन्हे-मुन्ने चिंटू जी!

हरदम बजती पीं-पीं सीटी
सारे दिन ही हल्ला-गुल्ला,
कोई टोके तो कहते हैं-
क्या मैं बैठा रहूँ निठल्ला?
बिना बात की बात बनाते,
नन्हे-मुन्ने चिंटू जी!