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ज़िन्दगी में बस यही इक सिलसिला बदला नहीं / सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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ज़िन्दगी में बस यही इक सिलसिला बदला नहीं ।
लाख बदले हमने मन्दिर, देवता बदला नहीं ।

उड़ कहीं भी आए बदले पेड़, गुलशन, टहनियाँ,
हमने लेकिन ज़िन्दगी में घौंसला बदला नहीं ।
.
जान कर भी उस गली में अब नहीं रहता है वो,
क्या पता क्यों हमने अपना रास्ता बदला नहीं ।

इस शहर में हर कोई अपनी जगह बदला किया,
बस फ़क़ीरों ने यहाँ अपना पता बदला नहीं ।

वक़्त ने दे दी हमीं यूँ तो सज़ा-ए-मौत भी,
हम हैं ज़िन्दा उसने चाहे फ़ैसला बदला नहीं ।

हमने सोचा पूज कर उसको वफ़ा सिखलाएँगे,
देवता तो बन गया पर बेवफ़ा बदला नहीं ।

जिसने जब-जब भी लिखी है ज़िन्दगी की ये ग़ज़ल,
बस रदीफ़ों को ही बदला काफ़िया बदला नहीं ।