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ज्ञान का वाण / शब्द प्रकाश / धरनीदास

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ज्ञानको वान लगो धरनी जन सोवत चौंकि अचानक जागे।
छूटि गवो विषया विष बंधन पूरन प्रेम-सुधारस पागे॥
भावत वाद विवाद विषाद न, स्वाद जहाँ लगि से सब त्यागे।
मूँदि गई अँखियाँ तबते, जबते हियमें कछु हेरन लागे॥21॥