भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

154 / हीर / वारिस शाह

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:21, 31 मार्च 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=वारिस शाह |अनुवादक= |संग्रह=हीर / व...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

महर देखके दोहां इकठयां नूं गुस्सा खायके होया ई रत बन्नां
एह देखो अपराध खुदाय दा ए बेले विच अकलियां फिरन रन्नां
अखीं नीवियां रख के ठुमक चली कछेमार के चूरी दा थाल छन्नां
चूचक आखया रख तूं जमा खातर तेरे सोटयां दे नाल लिंग भन्नां

शब्दार्थ
<references/>