भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

लंका काण्ड / भाग 2 / रामचंद्रिका / केशवदास

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:15, 16 जनवरी 2015 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=केशवदास |अनुवादक= |संग्रह=रामचंद्...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

‘कौन के सुत?’ बालि कें’ ‘वह कौन बलि’ न जानिए?
‘काँख चापि तुम्हें जो सागर सात न्हात बखानिए’।।
‘है कहाँ वह वीर?’ अंगद ‘देवलोक बताइयो’
‘क्यों गयो?’ ‘रघुनाथ वान-बिमान बैठि सिधाइयो’।।20।।
‘लंकनायक को?’ ‘विभीषण, देव-दूषण को दहै’?
‘मोहि जीवत होहि क्यों?’ ‘जग तोहि जीवत को कहै‘?
‘मोहिं को जग मारिहै?’ दुर्बुद्धि तेरिय जानिए’।
‘कौन बात पठाइयो कहि वीर बेगि बखानिए’।।21।।

सवैया
अंगद-

श्री रघुनाथ कौ वानर केसव आयौ हो एकु, न काहू हयौ जू।
सागर को मद झारि, चिकारि त्रिकूट के देह बिहार छयौ जू।।
सीय निहारि सँहारि कै राच्छस सोक असोक बनीहि दयौ जू।
अच्छकुमारहिं मारि कै लंकहिं जारि कै, निकेहिं जात भयौ जू।।22।।

गंगोदक छंद

राम राजान के राज आये इहाँ
धाम तेरे महाभाग जागे अबै।
देवि मंदोदरी कुंभकरणादि दै
मित्र मंत्री जिते पूँछि देखौ सबै।।1।।
राखिजै जाति कौं, भाँति (आबरू) को वंश कों
साधिजै लोक मैं लोक पलोक कों।
आनि कै पाँ परौ देस लैं, कोस लै
आसुही ईस सीता चलैं ओक कों।।23।।
रावण-लोक लोकेस स्यौं सोचि ब्रह्मा रचे
आपनी आपनी सींव सो सो रहै।
चारि बाहैं धरे विष्णु रच्छा करैं,
बात साँची यहै वेदवाणी कहैं।।
ताहि भू्र भंग ही देव देवेस स्यौं-
विष्णु ब्रह्मादि दै रुद्रजू संहरै।
ताहि हौं छाँड़ि कै पायँ काके परों
आजु संसार तो पायँ मेरै परैं।।24।।

मदिरा छंद

‘राम कौ काम कहा?’ ‘रिपु जीतहिं’
‘कौन कबै रिपु जीत्यौ कहाँ?’
‘बालि बली’, ‘छल सों’, ‘भृगुनंदन
गर्व हर्यो’, ‘द्विज दीन महा।।’
‘दीन सो क्यौं? छिति छत्र हत्यौ
बिन प्राणानि हैहयराज कियो।’
‘हैहय कौन?’ ‘वहै, बिसरîो? जिन
खेलत ही तुम्हैं बाँधि लियो’।।25।।

विजय छंद

अंगद-
सिंधु तरो उनको बनरा, तुसपै धनुरेख गई न तरी।
बाँध्योइ बाँधत सो न बँध्यो उन बारिधि बाँधि कै बाट करी।।
अजहूँ रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हैं दसकंठ न जानि परी।
तेलनि तूलनि पूँछि जरी (जड़ी हुई, युक्त) न जरी गढ़, लंक जराई जरी।।26।।

रावण-

नील सुखेन हनू उनके, नल और सबै कपि-पुंज तिहारे।
आठहु आठ दिसा बलि दै, अपनो पदु लै पितु जालगि मारे।।
तौसें सपूतहि जाइकै बालि अपूतन की पदवी पगु धारे।
अंगद संग लै मेरौ सबै दल, आजुहिं क्यों न हनै बप मारे।।27।।
(दोहा) जो सुत अपने बाप को, बैर न लेइ प्रकास।
तासौं जीवत ही मरîो, लोक कहैं तजि त्रास।।28।।
अंगद- इनकौं बिलगु न मानिए, सुनि रावन पल आधु।
पानी पावक पवन प्रभु, ज्यौं असाधु त्यौं साधु।।29।।

द्रुतविलंबित छंद

रावण-

उरसि अंगद लाज कछू गहौ। जनकघातक बात बृथा कहौ।
सहित लक्ष्मण रामहिं संहरौं। सकल वानर राज तुम्हैं करौं।।30।।

निशिपालिका छंद

अंगद- सुत्र, सम, मित्र हम चित्त पहिचानहीं।
दूत-विधि नूत (तनून, नवीन) कबहूँ न उर आनहीं।।
आप मुख देखि अभिलाष अभिलाषहु।
राखि भुज सीस, तब और कहँ राखहूँ।।31।।

भुजंग प्रयास छंद

रावण- महामीचु दासी सदा पाइँ धोवै।
प्रतीहार ह्वै के कृपा सूर जोवै।।
क्षपानाथ लीन्हैं रहै छत्र जाको।
करैगो कहा सत्रु सुग्रीव ताको।।32।।
सका (सक्का, पानी भरने वाला) मेघमाला, सिखी (अग्नि) पाककारी।
करै कोतवाली महादंडधारी।।
पढ़ै वेद ब्रह्मा सदा द्वार जाके।
कहा बापुरो सत्रु सुग्रीव ताको।।33।।

विलय छंद

अंगद- पेट चढ्या, पलना पालिको चढ़ि
पालकि हू चढ़ि मोह मढ्यो रे।
चौक चढ्यो, चित्रसारी चढ्यो,
गजबाजि चढ्यो, गढ़ गर्व चढ़îो, रे।।
व्योम विमान चढ़îो ई रह्यो
कहि केसव सो कबहूँ न पढ्यो रे।
चेतन नाहीं रह्यो चढ़ि चित्त सों,
चाहत मूढ़ चिताहू चढ्या रे।।34।।

भुजंगप्रयात छंद

रावण- निकारो जो भैया, लियो राज जाको।
दियो कढ़िकै जू कहा त्रात ताको।।
लिये बानराली कहौं बात तोसों।
सो कैसे लरै राम संग्राम मोसों।।35।।

विजय छंद

अंगद-
हाथी न, साथी न, घोरे न, चेरें न गाउँ न ठाउँ को टाउँ बिलैहै।
तात न मात, न पुत्र, मित्र, न वित्त, न तीय कहीं सँग रैहै।।
केसव काम को राम बिसासरत और निकाम न कामहिं ऐहै।
चेति रे चेति अजौं चित अंतर, अंतकलोक अकेलोई जेहै।।36।।

भुजंगप्रयात छंद

रावण- डरै गाय विप्रै, अनाथै जो भाजै।
परद्रव्य छाँड़ै परस्त्रीहिं लाजै।।
परद्रोह जासों न होवै रती को।
सु कैसे लरै वेष कीन्हें यती को।।37।।
(दोहा) गेंद करेउँ मैं खेल को हरगिरि केसौदास।
शीश चढ़ाए आपने, कमल समान सहास।।38।।