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|संग्रह=बोली तूं सुरतां / प्रमोद कुमार शर्मा
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म्हारै घर रै
टूटयौड़े जंगळै वाळी खिड़की स्यूं
सोचूं:
चीड़ी उदास क्यूं नीं हुवै।
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