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क़तआत / सतीश शुक्ला 'रक़ीब'
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20 फ़रवरी
ऐ जहां वालो सुनो हम हो गए हैं साठ के
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न खाई न झूठी क़सम
खाएंगे
खाएँगे
हमजुदा हो के तुझसे न रह
पाएंगे
पाएँगे
हम
यक़ीं गर न हो देख ले आज़माकर
बिछड़ने से पहले ही मर
जाएंगे
जाएँगे
हम
38
सज गया है फ़लक चाँद की दीद है
SATISH SHUKLA
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